Thursday, August 6, 2015

बनारस कन्वेंशन में उठी बनारस शहर व उसकी संस्कृति को हेरिटेज़ घोषित करने की मांग

http://gorakhpurnewsline.com/wp/?p=1815

तीस्ता सीतलवाड़, डा० तीर विजय सिंह और नागेश्वर पटनायक को दिया गया जनमित्र सम्मान
 “काशी कुम्भ” और “सदभावना मैनुअल”  का हुआ विमोचन
वाराणसी, 10 अगस्त। नौ अगस्त क्रान्ति दिवस पर सांस्कृतिक शहर बनारस में बहुलतावाद एवं समावेशी संस्कृति के मज़बूतीकरण के लिए “बनारस सम्मलेन” का आयोजन बनारस के ‘मूलगादी कबीर मठ’ में किया गया | इस सम्मेलन में हिन्दुस्तान के विभिन्न शहरों से प्रबुद्ध बुद्धिजीवी, समाजसेवी, पत्रकार, शिक्षाविद समेत उ० प्र० के विभिन्न जिलों से आये डेढ़ हजार प्रतिभागियों ने भाग लिया | इस मौके पर मशहूर मानवाधिकार कार्यकत्री  तीस्ता सीतलवाड़, वरिष्ठ  पत्रकार डा० तीर विजय सिंह एवं नागेश्वर पटनायक को “जनमित्र सम्मान” से सम्मानित किया गया तथा “ बनारस शहर व उसकी संस्कृति ” को हेरिटेज़  घोषित करने की मांग करते हुए 15 सूत्री प्रस्ताव पारित किया गया।
कार्यक्रम का शुभारम्भ बनारस घराने के विख्यात सरोदवादक पं० विकास महाराज एवं तबलावादक पं० प्रभाष महाराज, सितार वादक अभिषेक महाराज के शास्त्रीय संगीत से हुआ | इसके बाद कबीर के कर्मस्थली रहे कबीर के चबूतरे से बहुलतावाद व समावेशी संस्कृति एवं गंगा के निर्मलता-अविरलता के समर्थन में विभिन्न धर्मों के धार्मिक गुरुओं ने अपना विचार रखा और कार्यक्रम में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते हुए बहुलतावाद व समावेशी संस्कृति को बचाने के लिए अपना पूर्ण समर्थन दिया ताकि बनारस की साझा संस्कृति को बनाये रखते हुए इसकी ताज़गी व फक्कड़पन को जिन्दा रखा जा सके |
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इस अवसर पर द्वारका पीठ के शंकराचार्य काशी प्रान्त के प्रतिनिधि स्वामी अवमुक्तेश्वरा नन्द जी, मुफ़्ती-ए-शहर बनारस मौलना अब्दुल बातिन नोमानी, वरिष्ठ इस्लामिक चिंतक मौलाना हारून रशीद नक्शबंदी, बौद्ध धर्म गुरु भंते कीर्ति नारायण, बनारस डायोसिस के निदेशक फ़ादर गैब्रील, फ़ादर आनन्द सहित बौद्ध धर्म, जैन धर्म, कबीर व रैदास पंथ के सम्मानित लोगों ने कार्यक्रम में भाग लिया | विभिन्न धर्म गुरुओं ने अपने-अपने धर्म के मतो, विचारों, मान्यताओं व मानवीय मूल्यों के आधार पर समावेशवाद एवं बहुलतावाद विषय पर प्रकाश डाला एवं गंगा के निर्मलता-अविरलता पर आम समाज व सरकार दोनों को संवेदनशील होकर मज़बूत क़दम उठाने का संयुक्त आह्वान किया | विभिन्न विचारकों ने कहा कि आधुनिक उपभोक्तावाद के समय में भी बनारस के आध्यात्मिक मूल्य व समावेशी विशेषता की महत्ता पर कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ा है, जिसके कारण आज भी बनारस अपने फक्कड़पन जीवन शैली के साथ जीवन्त है | इस कार्यक्रम में गंगा व उसकी अन्य सहायक नदियों की दयनीय स्थिति पर भारत के विभिन्न आईआईटी द्वारा किये गए विस्तृत शोध के उपरांत काशी में आयोजित किये गए “काशी कुम्भ” की रिपोर्ट का विभिन्न धार्मिक गुरुओं ने संयुक्त रूप से विमोचन किया |
इस अवसर पर बहुलतावाद एवं समावेशी परम्परा व संस्कृति के लिए उत्कृष्ट कार्य हेतू सुप्रसिद्ध समाजसेवी एवं मानवाधिकार कार्यकत्री सुश्री तीस्ता सीतलवाड़, सुप्रसिद्ध पत्रकार व हिन्दुस्तान पटना के वरिष्ठ सम्पादक डा० तीर विजय सिंह एवं भुवनेश्वर के इकोनॉमिक टाइम्स के वरिष्ठ पत्रकार नागेश्वर पटनायक को “जनमित्र सम्मान” से सम्मानित किया गया | बनारस के बहुलतावाद व समावेशी संस्कृति को शास्त्रीय संगीत के सुरीले धुनों से भारत ही नहीं पुरे विश्व में फ़ैलाने वाले व देश का नाम देश-विदेश में रोशन करने वाले विख्यात सरोदवादक पं० विकास महाराज व उनके पुत्र तबलावादक पं० प्रभाष महाराज कोमानवाधिकार जननिगरानी समिति ( पीवीसीएचआर ) का ‘ राजदूत ’ बनाते हुए प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया गया |
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इस अवसर पर बनारस के कोलअसला क्षेत्र से विधायक अजय राय, रमन मैगसेसे अवार्डी व जलपुरुष राजेन्द्र सिंह, वरिष्ठ पत्रकार डा० तीर विजय सिंह, प्रो० दीपक मलिक, पदमश्री सम्मान से सम्मानित तीस्ता सीतलवाड़ ने भी सभा को संबोधित किया और “सदभावना मैनुअल” का विमोचन किया गया | इसके उपरान्त उपस्थित सभी गणमान्य व्यक्तियों द्वारा  “ बनारस कन्वेंशन ”में तय प्रस्ताव को पारित सर्वसम्मति से पारित किया गया |
कार्यक्रम में आशीष मिश्रा व सहयोगियों द्वारा कबीर वाणी में गीत प्रस्तुत किया गया और प्रेरणा कला मंच द्वारा “गंगा हो या गांगी” शीर्षक नाटक का संवेदनशील मंचन किया गया | सुप्रसिद्ध वृत्तचित्र निर्माता व निदेशक गोपाल मेनन की मुज्जफ़रनगर दंगे पर वृत्तचित्र  का प्रदर्शन किया गया। कार्यक्रम के अंत में सम्मलेन के समापन के बाद कबीरचौरा मठ से लहुराबीर आजाद पार्क तक “कबीर पद यात्रा” भी निकली गयी | कन्वेंशन का संचालन सुप्रसिद्ध रंगकर्मी व्योमेश शुक्ला व समाजसेवी अतिक अंसारी द्वारा किया गया |
इस अवसर पर बनारस कन्वेंशन कार्यक्रम के उद्देश्य व विषय वस्तु पर डा० लेनिन रघुवंशी ने विस्तृत प्रकाश डाला और उन्होंने कहा कि हम लोग मिलजुल कर “ बनारस शहर व उसकी संस्कृति ” को हेरिटेज़ घोषित कराये जाने के लिए राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर लगातार सरकार व यूनेस्को पर दबाव डालते रहेंगे | इसके लिए एक वेबसाइट “banarasconvention.com” एवं फेसबुक पेज बनाया जाएगा | कार्यक्रम में स्वागत भाषण मुनीज़ा रफ़ीक खान एवं धन्यवाद ज्ञापन श्रुति नागवंशी ने किया |
बनारस कन्वेंशन में पारित प्रस्ताव
1 -बनारस घराना के संगीतज्ञ जहाँ एक तरफ हिन्दू देवी-देवताओं की स्तुति गायन के साथ अपना शास्त्रीय संगीत का शुभारम्भ करते हैं वही अफगानिस्तान से आये सरोद,  ईरान से आये शहनाई व सितार का गौरव के साथ उपयोग करते है । शास्त्रीय संगीत की इस संयुक्त परम्परा को बनारस में जीवित रखने के लिए सरकारी स्तर पर प्रयास किया जाए।  बनारस में शास्त्रीय संगीत को जीवंत बनाये रखने के लिए एक बड़ा “ हिन्दुस्तानी संगीत संस्थान ” बनाया जाना चाहिये।  जहाँ पर देश-विदेश के छात्र आकर संगीत शिक्षा प्राप्त कर सकें और पर्यटन को भी बढ़ावा मिले।
2-  हिन्दू, बौद्ध,   इस्लाम,  ईसाई,  यहूदी,  बहाई,  जैन, सिख, संत परम्परा, सूफी पंथ सभी का बनारस से जुड़ाव रहा है । इस साझा संस्कृति व परम्परा को बचाए रखते हुए संयुक्त रूप से सांप्रदायिक ताकतों के खिलाफ़ लोगों को जागरूक किया जाये ताकि बनारस की गंगा-जमुनी तहज़ीब को बरक़रार रखा जा सके।
3- बनारस बहुलतावाद व समावेशवाद का एक बहुत बड़ा केन्द्र  है और यह केन्द्र ‘ गंगा तटीय सभ्यता का हेरिटेज ’ है ।  जिससे भारत ही नहीं, पूरी दुनिया के लोग सामाजिक सौहार्द, सामंजस्य व भाईचारे की भावना सीख सकते है, कि अपने अन्तर्विरोधों के साथ भी सहिष्णुता से कैसे रहा जा सकता है। इसलिए आस्था, विश्वास व तर्क के शहर बनारस के इतिहास, प्रमुख स्थलों व बनारस शहर की साझा संस्कृति को “ हेरिटेज ” घोषित किया जाए ।
 4-   गंगा और उसकी 1500 सहायक नदियों की अविरलता को बनाये रखते हुए निर्मलता के साथ बिना अवरोध बहने दिया जाए ताकि नदी तटीय सभ्यता को बचाया जा सके।  बनारस को ‘ गन्दा जल नहीं, गंगा जल ’ मुहैया कराया जाए ।
   5- नदियाँ हमारे संस्कृति व सभ्यता का केन्द्र हैं।  लोगों की आजीविका, धार्मिक आस्था, आध्यात्मिकता, गरिमा, जीवन व सभ्यता इसी से जुड़ा है।  इसलिए भारत सरकार को नदियों को संस्कृति विभाग के अधीन किया जाए।
6-     भगवान शिव के प्रिय साड़ “ नंदी ” को बनारस शहर में पीने का पानी और पशु चिकित्सक भी मुहैया कराया जाए ।
7-     सिंगापुर की तर्ज पर पुराने बनारस शहर को हेरिटेज के तौर पर संजोया जाए और नये शहर को आधुनिक दुनिया की तरह पुराने शहर से अलग दूसरी जगह बसाया जाए ।
8-   बनारस शहर के शिल्प कला के बिनकारी (बनारसी साडी उदद्योग), लकड़ी के खिलौने के काम ,जरदोजी, देवी-देवताओं के मुकुट की कला व सनत को प्रोत्साहित व संरक्षित किया जाय । इन उद्योगों को बचाने के लिए बजट में अधिक आवंटन किया जाये और इन उद्योगों से जुड़े लोगों को विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं से जोड़ा जाये।
9- दुनिया के विभिन्न सेनाओं व पुलिस के बैज भी बनारस में बनते है । श्री कृष्ण का तांबे का झूला बनारस में बनाया जाता है।  हिन्दू देवी-देवताओं के वस्त्र, मुकुट, माला बनारस के मुस्लिम दस्तकार व बुनकर बनाते हैं । ऐसे सभी शिल्प कला व सांस्कृतिक धरोहरों को बचाने के लिए सरकार प्रभावी योजना बनाकर ऐसे कारीगरों व तबकों को पुनर्जीवित व संरक्षित करे।
10- बनारस के बहुलतावाद और समावेशी इतिहास को बनारस के स्कूलों, मदरसों व अन्य शैक्षणिक संस्थानों में पढ़ाया जाय । जिससे अगली पीढ़ी बनारस के धरोहर को आदर और सम्मान से संभाल सके |
11-  बनारस के सभी पर्यटन स्थल, सांस्कृतिक केन्द्र को भी पर्यटन की सूची में शामिल करते हुए विकसित किया जाए और इन महत्वपूर्ण केन्द्रों को भी पर्यटन व संस्कृति विभाग से जोड़ा जाए।  ताकि अधिक से अधिक पर्यटकों को बनारस की प्राचीन व गौरवशाली परम्परा व इतिहास से जोड़ा जा सके । जैसे : मार्कंडेय महादेव, बाबा विश्वनाथ मन्दिर, मृत्युन्जय महादेव, रामेश्वर, बाबा कालभैरव, संकट मोचन मन्दिर, मूलगादी कबीर मठ व कबीर जन्म स्थलीय,ढाई कंगूरा की मस्जिद, मानसिंह का वेधशाला, कारमाईकल लाइब्रेरी, मौलाना अल्वी की मज़ार, नागरीय प्रचारणी सभा, मुंशी प्रेमचन्द्र का घर, धरहरा की मस्जिद, जैन तीर्थंकर स्थल, चौहट्टा लाल खां का मकबरा, अनेक कुण्ड व तालाब इत्यादि।
12-     बनारस उसके प्राचीन व गौरवशाली इतिहास को संजोते हुए उनके सभी महत्वपूर्ण एतेहासिक तथ्यों, पुस्तकों, दस्तावेज़ों, वस्तुओं को संस्कृति विभाग के अधीन संग्रहालय (Museum) बनाकर संरक्षित और पुनर्जीवित किया जाये।
13- बनारस शहर में रहने वाले बेघर ग़रीब नागरिकों, वृद्धों, महिलाओं के लिए सरकारी स्तर पर आश्रय स्थल व रहने के लिए मकान, स्थान की व्यवस्था किया जाये।
  14-   बनारस में गंगा किनारे रहने वाले आर्थिक रूप से कमज़ोर नाविक समाज व उनके बच्चों, बुनकरों व उनके बच्चों एवं अति वंचित मुसहरों व अन्य समुदायों को स्वास्थ्य, सुरक्षा, शिक्षा तथा सस्ते ऋण जैसे महत्वपूर्ण मूलभूत कल्याणकारी योजनाओं से जोड़ा जाए और पुनर्वासित किया जाए।  ताकि समाज का वह तबका भी विकास की मुख्य धारा से जुड़ सके।
15-  बनारस के गौरवशाली इतिहास के साक्षी रहे वे संस्थान व पुस्तकालय, कुण्ड, तालाब जो दबंगों व पूंजीपतियों के अवैध कब्ज़े में हैं, उन्हें मुक्त कराते हुए सरकार द्वारा अपने संरक्षण में लेकर सरकारी देख-रेख में संरक्षित और पुनर्जीवित किया जाए।

बनारस में शास्त्रीय संगीत को जीवंत बनाये-पं० विकास महाराज

बनारस घराना के संगीतज्ञ जहाँ एक तरफ हिन्दू देवी-देवताओं की स्तुति गायन के साथ अपना शास्त्रीयसंगीत का शुभारम्भ करते हैं । वही अफगानिस्तान से आये सरोद, ईरान से आये शहनाई व सितार का गौरव के साथ उपयोग करते है । शास्त्रीय संगीत की इस संयुक्त परम्परा को बनारस में जीवित रखने के लिए सरकारी स्तर पर प्रयास किया जाए |बनारस में शास्त्रीय संगीत को जीवंत बनाये रखने के लिए एक बड़ाहिन्दुस्तानी संगीत संस्थान बनाया जाना चाहिये| जहाँपर देश-विदेश के छात्र आकर संगीत शिक्षाप्राप्त कर सकें और पर्यटन को भीबढ़ावा मिले |उत्तर प्रदेश सरकार एवं भारत सरकार से निवेदन है कि बनारस सम्मलेन की प्रस्तावों को गंभीरता से लेकर लागू करें |

Friday, July 31, 2015

My 20 days in Germany

Before leaving to Germany on 4 May, I received an attack of defamation through the collective conspiracy of corrupt elements of police, administration and civil society. Civil society in a democratic state is generally defined as the space filled by non-governmental organisations and institutions that represent citizens' interest and the public will, and which are independent from the state. Hegel, the philosopher of the modern state, considered that civil society, with all its differences, made the nation state more efficient. But the elite section of Indian society, in nexus with corrupt police and administrators, want to maintain status quo of mind, of caste and patriarchy. So, they always desire to silence the voice of dissent, by hook or crook. Many times, they collaborate with international players who think in the same way of manipulation of power grabbing.
Please read follows article:

Wednesday, July 29, 2015

Global meeting on testimony at Oxford

--------without justice, peace promotes culture of silence with impunity. The main learning of all three papers was that elimination of masculinity through participation and empowerment of women in reconciliation process is main the instrument to achieve sustainable peace against war.


Sunday, July 5, 2015

Way of Struggle: Lenin Raghuvanshi

Way of struggle: Lenin Raghuvanshi

Raghuvanshi Lenin
is the Lenin of his motherland
his nerves squirming with pain of injustice
his voice rising in passion for social justice


As Buddha suffered from pain
from his enclave
who found the path of freedom from pain
in the social code of conduct of spirituality

Raghuvanshi Lenin has seen and known
the reason of grief from depth
in the contemporary contexts
the nation and powerful energies
are more blameworthy than human being

The claw of exploitation
tightens continuously
the nerves of throat and wisdom
the silent roots of malpractice
are silent against oppression and injustice
(one has to work like ‘Chanakya’ to uproot them)
as an intellectual worker like a modern Buddha
not leaving behind wife (Shruti) and son (Kabir)
but taking them along, so that they also feel
the wounds of society
the pain of people

living in the society
they can treat and cure
and give some first-aid
and feel Lenin’s pain and outcry
they should do positive revolt
like the two hands of Lenin - left and right
and fulfil the role as part of family
not just as Lenin’s family
but also as people’s family
like the parts of the body
and can sacrifice the comforts
attachment towards luxuries
for the sake of global human being
for the interest of entire humanity

Raghuvanshi Lenin is the Lenin of India
related to the King’s lineage
associating with it, being with it
in the contemporary times
digging out paths for the people
from deep inside the system
He names his child as ‘Kabir Karunik’
to make him walk through the life’s tough workshop
and see the secret source of Lenin’s speech
the tragic sorrow caused by discrimination
and experience the meaning of being ‘Kabri’
as his father Lenin
knows the meaning of his name
in Indian contexts

He knows and wants to show
that the lineage of all the people,
the lineage of ‘Shri Ram’
can be cultivated
not by chanting the name of ‘Ram’
but by following the path of ‘Ram’ - public service
in the true sense, including king’s lineage

along with Buddha,
along with Kabir,
along with Lenin
and the people of the universe
in the form of entire Humankind 

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Professor Dr. Pushpita Awasthi
Netherlands
21/11/2014

Monday, June 29, 2015

At Michelstadt,Germany



With Shri Subhash Maharaj and Dr. Cristina Ricca (wife of Shri Subhash maharaj) at Michelstadt,Germany (https://en.wikipedia.org/wiki/Michelstadt).


Experience
since 2011                               Trainer for Religious Diversity and Anti-Discrimination

since 2009                              Head of the Adult Education Center Badische Bergstrasse and managing director of the association community college and music school Badische Bergstraße

2013                                       training for aspiring heads of Adult Education Centers in Morocco on behalf of the Institute for International Cooperation of the German Adult Education Association - dvv international

since 2008                              consultant in adult education at the Cornelsen publishing house Berlin

2006-2009                              Head of Department for Vocational eV, psychology and health, and of Romance languages and languages of the world at the Adult Education Center (Volkshochschule) in Karlsruhe

2007-2009                              Lecturer in professional Librettology at the Institute of Music Theater at the University of Music Karlsruhe

2006-2009                              Lecturer for Italian Language and Culture at the University of Applied Sciences Karlsruhe

2001-2006                              Trainer for General Education at the Adult Education Center (Volkshochschule) in Offenbach am Main

2005                                       trainer for Italian language and culture at the Adult Education Center (Volkshochschule) in Neu-Isenburg

1995-2005                              employee of German-Italian Association Frankfurt am Main, writer and editor of the journal “Italian”

2004-2009                              Lecturer in Musicology at the University of Music and Performing Arts, Frankfurt am Main

Intercultural Consulting for major corporations (Biotest) and banks (German Federal Bank, Deka)

2002-2004                               instructor at the community college Heusenstamm

Since 2002                             lecturer at the Institute of Musicology at Goethe University Frankfurt am Main

2001-2002                              trainer for Italian language and culture at the Adult Education Center (Volkshochschule) Frankfurt am Main

since May 1997                      Freelancer at Hessischer Rundfunk

1995 and 1996,           support for the international summer courses at the Goethe University Frankfurt

Board Memberships
            Board of Trustees of the Society for Christian-Jewish Cooperation Rhein Neckar
            Diversity Council of Adult Education Association Baden-Württemberg
            Women's Committee of the German Adult Education Association
            Steering Group of the National Conference of urban Adult Education Centers


Linguistic proficiency
Italian (Native speaker)
French (fluent)
German (fluent)
English (very good)

Hindi (Basic)

Friday, June 12, 2015

14 Indian NGOs Support Liberty Residents