केंद्र और राज्य सरकार की तमाम कोशिशों के बावजूद आर्सेनिक प्रदूषण की समस्या पूरी तरह से समाप्त नहीं हुई है और इसके समाधान के लिए ठोस रणनीति अपनाने की जरूरत है। बनारस के एक्टिविस्ट डॉ. लेनिन कहते हैं, “आर्सेनिक विषाक्तता से स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ते हैं। लंबे समय तक इसके संपर्क में रहने से कैंसर, त्वचा संबंधी रोग, हृदय रोग, मधुमेह और संज्ञानात्मक विकास से जुड़ी समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं।
विशेष रूप से गर्भावस्था और बाल्यावस्था में इसके प्रभाव अधिक हानिकारक होते हैं, क्योंकि यह मस्तिष्क के विकास को प्रभावित कर सकता है और युवाओं में मृत्यु दर को बढ़ा सकता है।
डा.लेनिन यह भी कहते हैं, “आर्सेनिक विषाक्तता को चिकित्सा विज्ञान में ‘आर्सेनिकोसिस’ कहा जाता है, जिसमें शरीर में आर्सेनिक के लगातार जमा होने के कारण विभिन्न प्रकार की विकलांगताएं उत्पन्न हो सकती हैं और स्थिति गंभीर होने पर मृत्यु भी हो सकती है।
आर्सेनिक का खाद्य शृंखला में प्रवेश एक गंभीर स्वास्थ्य संकट है, जिससे निपटने के लिए एक बहु-आयामी दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत है। सरकार, वैज्ञानिक समुदाय और आम जनता—सभी को मिलकर इस समस्या के समाधान के लिए प्रयास करने होंगे। आर्सेनिक प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए दीर्घकालिक रणनीति विकसित करनी होंगी, ताकि आने वाली पीढ़ियां इस विषैले तत्व के प्रभाव से सुरक्षित रह सकें।”
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